Desh prem
लाल क़िले की प्राचीर से,
फिर हुंकार पुरानी उठी।
गंगा, यमुना की धार में,
आज़ादी की रवीनियत उठी।
ये देश नहीं केवल माटी का,
ये तपस्या की तासीर है,
भगत, सुभाष और आज़ाद की,
लिखी हुई एक तक़दीर है।
वीर जवानों की साँसों से,
सजा हुआ ये तिरंगा है,
इसके तीन रंगों की छाया,
हर भारतीय का गहना है।
केसरिया हमें शौर्य सिखाए,
श्वेत शांति का राह दिखाए,
हरा रंग समृद्धि की गाथा,
जन-जन के मन में हर्षाए।
चक्र बीच में जो बहता है,
समय-प्रवाह को कहता है,
कर्म करो और आगे बढ़ो,
देश धर्म सर्वोपरि रहता है।
नव-प्रभात की इस बेला में,
हम सब मिलकर सौगंध लें,
भारत को महान बनाने की,
मन में अटूट तरंग लें।
मिटने न देंगे आन इसकी,
चाहे जो क़ुरबानी हो,
अमर रहे ये स्वतंत्रता,
ऐसी हर एक कहानी हो।
जय हिंद, जय भारत!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें